
(फुरकान अंसारी)
हरिद्वार, 13 मई। ज्वालापुर स्थित ईदगाह रोड पर स्थित मदरसा दारुल उलूम रशिदिया में मदरसा शिक्षा को लेकर एक बैठक आयोजित की गई। बैठक में मदरसों के संबंध में फैलाए जा रहे भ्रम और उनकी वास्तविक भूमिका पर विस्तार से चर्चा की गई।
मदरसा प्रबंधक मौलाना मोहम्मद आरिफ ने कहा कि मदरसा शिक्षा को लेकर समाज में भ्रम फैलाकर मदरसों को बदनाम करने का प्रयास किया जा रहा है, जबकि आधुनिक शिक्षा के साथ धार्मिक शिक्षा भी उतनी ही आवश्यक है। उन्होंने कहा कि मदरसों में बच्चे धार्मिक शिक्षा प्राप्त कर हाफिज, कारी, मौलवी और आलिम बनते हैं तथा मस्जिदों और मदरसों में शिक्षा देकर समाज को सही दिशा प्रदान करते हैं।
उन्होंने कहा कि जो लोग मदरसों के नाम पर केवल मॉडर्न शिक्षा दिखाकर मिड-डे मील एवं अन्य सरकारी सुविधाओं का दुरुपयोग कर रहे हैं, उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। मौलाना आरिफ ने कहा कि मदरसे वर्षों से देश में संचालित हो रहे हैं और स्वतंत्रता आंदोलन में भी मदरसों के शिक्षकों एवं छात्रों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। देश की आजादी के लिए अनेक लोगों ने बलिदान दिए हैं।
उन्होंने कहा कि मदरसों में बच्चों को देश के प्रति कर्तव्यों, ईमानदारी, सच्ची निष्ठा और धर्म के प्रति समर्पण की शिक्षा दी जाती है। मदरसों में पढ़ने और पढ़ाने वालों ने कभी भी सरकार विरोधी गतिविधियों में भाग नहीं लिया।
मौलाना मोहम्मद आरिफ ने सरकार से मांग करते हुए कहा कि मदरसा शिक्षा और आधुनिक शिक्षा के स्वरूप में अंतर को समझा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अधिकांश मदरसे सरकारी सहायता नहीं लेते, बल्कि समाज के सहयोग और चंदे से संचालित होते हैं। मदरसों का नियमित ऑडिट भी कराया जाता है और किसी प्रकार की अनियमितता नहीं होती। इसलिए मदरसों के लिए अलग से किसी प्राधिकरण या बोर्ड के गठन की आवश्यकता नहीं है।
बैठक में मास्टर साजिद हसन ने कहा कि मदरसों में गरीब एवं आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराई जा रही है। उन्होंने लोगों से अपील की कि बिना सही जानकारी के मदरसा शिक्षा को बदनाम न किया जाए।
इस अवसर पर मास्टर इसरार, मास्टर रिजवान, कारी बसीर, मास्टर साजिद हसन, कारी असद सहित कई लोग उपस्थित रहे।












